दक्षिण अफ्रीका में चल रहा फीफा विश्व कप अब अपने अंतिम चरण की तरफ बढ़ रहा है और सभी को इस बात का इंतजार है कि कौन सी टीम चैंपियन बनेगी।
मनोज चतुर्वेदी
लेकिन इससे पहले रेफरियों के कुछ गलत फैसलों ने इस विश्व कप का जायका थोड़ा खराब कर दिया है। इससे अब यह चर्चा चलने लगी है कि क्या फुटबाल में भी क्रिकेट, टेनिस, हॉकी, आइस हॉकी और बास्केटबाल की तरह तीसरी आंख यानी वीडियो सिस्टम की मदद लेनी चाहिए। खेलों में प्रोघौगिकी के इस्तेमाल के समर्थक और विरोधी हमेशा से रहे हैं। इसलिए फुटबाल में भी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के पक्ष और विपक्ष में प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
फीफा अध्यक्ष सेप ब्लेटर ने पहले तो टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की बात सिरे से नकार दी थी पर दवाब बनने पर अगले माह कार्डिफ में होने वाली फीफा की बैठक में इस बारे में विचार करने की बात मान ली। इससे इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि देर-सबेर फुटबाल में वीडियो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शुरू हो सकता है।
असल में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के विरोधियों का मानना रहा है कि अगर रेफरी के फैसलों की समीक्षा का सिस्टम शुरू किया गया तो खेल की लय जाती रहेगी जिससे उसका रोमांच ही खत्म हो जाएगा। पर टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के समर्थकों का मानना है कि खेल की लय से ज्यादा महत्वपूर्ण गलत फैसले के कारण किसी टीम की चुनौती खत्म होने से बचाना है। इस विश्व कप के दौरान रेफरियों के पांच-छह गलत फैसले चर्चा में आने से इस बहस ने जोर पकड़ा है। एक फैसला तो जर्मनी के खिलाफ प्री क्वार्टर फाइनल मैच में इंग्लैंड के फ्रेंक लैंपर्ड द्वारा 20 यार्ड से गोल करना और इसे रेफरी द्वारा नकारा जाना रहा। इस मौके पर गेंद बार के अंदरूनी हिस्से से टकराकर गोल लाइन के अंदर गिरी और गेंद स्पिन होकर बाहर आ गई और लाइंसमैन इसे नहीं देख पाये। उसके इशारे पर रेफरी ने गोल नहीं दिया। उस समय इंग्लैंड की टीम 1-2 से पिछड़ी हुई थी और वह यदि बराबरी पा लेती तो परिणाम उसके पक्ष में बदल भी सकता था।
इसी तरह मैक्सिको के खिलाफ मैच में टेवेज ने ऑफसाइड रहते गोल जमा दिया और रेफरी और लाइंसमैन इस पर निगाह रख ही नहीं सके। इस समय तक मैक्सिको खेल पर हावी था और यह गोल पड़ते ही उसकी लय बिगड़ गई और अर्जेंटीना ने आसानी से मैच जीत लिया।
फीफा पर प्रोघौगिकी के इस्तेमाल के लिए लंबे समय से दवाब बनता रहा है लेकिन वह इसके पक्ष में नहीं रही है। ब्लेटर की मौजूदा स्वीकारोक्ति से यही लगता है कि वह गोल के मामले में तो टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की बात तो मान रहे हैं पर अन्य मामलों में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के अब भी पक्षधर नहीं हैं। यह सही है कि तेज गति से खेले जाने वाले इस खेल में बार-बार रेफरी के फैसले की समीक्षा के लिए खेल को रोका गया तो इसका मजा किरकिरा होगा। असल में क्रिकेट और टेनिस में वीडियो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल फुटबाल के मुकाबले आसान है। टेनिस में तो पहले ही कई लाइन जज होते हैं और उन्हें एक स्थान पर बैठकर फैसला करना होता है। इस पर भी खिलाड़ी को किसी लाइन कॉल पर शंका होती है तो वह समीक्षा के लिए कहता है।
इसी तरह क्रिकेट में अंपायर के नजदीकी फैसलों के लिए तीसरे अंपायर की मदद लेने का चलन है पर अब कुछ समय से रेफरल सिस्टम की शुरूआत हुई है। क्रिकेट में फैसले की समीक्षा के दौरान खेल रूकने का कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन हॉकी में जरूर फुटबाल की तरह ही खेल की लय में फर्क आने का डर रहता है। पिछले दिनों दिल्ली में हुए विश्व कप में फैसलों की समीक्षा की व्यवस्था की गई थी और इसका खेल के प्रवाह पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा।
फुटबाल रेफरी कह रहे हैं कि फैसलों में गलती होना खेल का हिस्सा होता है और इसे मानवीय भूल से ज्यादा कुछ नहीं माना जा सकता है। उनके अनुसार इतने बड़े आयोजन में दो-तीन प्रतिशत गलत फैसले कोई मायने नहीं रखते। लेकिन इन तीन प्रतिशत फैसलों से यदि दो-तीन परिणाम भी उलट-पुलट जाते हैं तो यह गंभीर मामला है। इस बारे में फीफा को जल्द ही कोई न कोई फैसला करना होगा। इसके लिए वह गोल क्षेत्र के फैसलों के लिए वीडियो टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर सकता है। साथ ही लाइंसमैन की संख्या दो से बढ़ाकर चार कर सकता है। इतना जरूर है कि उसके लिए अब इस तरफ सोचने का समय आ गया है।
Source: http://www.samaylive.com/sports-hindi/football-world-cup-2010/index.1.html
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